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पटना में हाईटेक साइबर ठगी रैकेट का भंडाफोड़, ऑनलाइन गेमिंग और सट्टेबाजी के नाम पर देशभर के लोगों को बनाते थे शिकार

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पटना।राजधानी पटना में साइबर अपराध के खिलाफ चल रही कार्रवाई के बीच पुलिस ने एक ऐसे संगठित गिरोह का पर्दाफाश किया है, जो ऑनलाइन गेमिंग और सट्टेबाजी के नाम पर लोगों को जाल में फंसाकर बड़े पैमाने पर ठगी कर रहा था। यह नेटवर्क किसी दूरदराज के अज्ञात ठिकाने से नहीं, बल्कि शहर के रिहायशी इलाके में स्थित एक साधारण फ्लैट से संचालित किया जा रहा था। पुलिस की छापेमारी में जो तस्वीर सामने आई, उसने यह साफ कर दिया कि साइबर अपराध अब छोटे स्तर की ठगी तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह एक सुनियोजित, तकनीकी रूप से सक्षम और बहुस्तरीय आपराधिक कारोबार का रूप ले चुका है।
मामला पटना के शास्त्री नगर थाना क्षेत्र का है, जहां पुलिस को गुप्त सूचना मिली थी कि शिवपुरी इलाके के एक अपार्टमेंट में संदिग्ध गतिविधियां संचालित की जा रही हैं। सूचना को गंभीरता से लेते हुए पुलिस ने त्वरित कार्रवाई की और संबंधित फ्लैट पर छापा मारा। बाहर से सामान्य दिखने वाला यह फ्लैट अंदर से किसी डिजिटल ऑपरेशन सेंटर की तरह तैयार किया गया था। कमरे में बड़ी संख्या में मोबाइल फोन, सिम कार्ड, लैपटॉप और बैंकिंग से जुड़े दस्तावेजों की मौजूदगी ने पुलिस को यह समझने में देर नहीं लगाई कि यहां कोई सामान्य कॉल सेंटर नहीं, बल्कि ठगी का संगठित अड्डा चल रहा था।
प्रारंभिक जांच में यह सामने आया कि गिरोह के सदस्य ऑनलाइन गेमिंग, बेटिंग और सट्टेबाजी से जुड़े आकर्षक ऑफर, आसान कमाई और बोनस जैसे झूठे वादों के जरिए लोगों को अपने जाल में फंसाते थे। सोशल मीडिया, मैसेजिंग ऐप, टेलीग्राम चैनल, व्हाट्सऐप ग्रुप और अन्य डिजिटल माध्यमों के जरिए संभावित शिकारों तक पहुंच बनाई जाती थी। लोगों को यह भरोसा दिलाया जाता था कि वे बेहद कम निवेश में बड़ा मुनाफा कमा सकते हैं। जैसे ही कोई व्यक्ति इनके संपर्क में आता, उसे चरणबद्ध तरीके से इस फर्जी सिस्टम में उलझाया जाता और फिर उसके बैंक खाते, यूपीआई, कार्ड या अन्य डिजिटल भुगतान माध्यमों के जरिए पैसे निकाल लिए जाते।
पुलिस को मौके से भारी मात्रा में इलेक्ट्रॉनिक और वित्तीय साक्ष्य मिले हैं। बरामद सामानों में 21 स्मार्टफोन, 24 सक्रिय सिम कार्ड, कई एटीएम कार्ड, चेक बुक और दो हाई-स्पीड लैपटॉप शामिल हैं। इन डिवाइसों का इस्तेमाल कथित तौर पर फर्जी पहचान, अलग-अलग बैंकिंग प्रोफाइल, बहु-स्तरीय संपर्क और डिजिटल ठगी को अंजाम देने के लिए किया जा रहा था। एक ही फ्लैट से इतनी बड़ी संख्या में उपकरणों का मिलना इस बात की ओर इशारा करता है कि गिरोह काफी संगठित तरीके से काम कर रहा था और उसके पास ऑपरेशन को कई स्तरों पर चलाने की तकनीकी तैयारी मौजूद थी।
जांच में यह भी सामने आया है कि गिरोह केवल स्थानीय स्तर पर सक्रिय नहीं था, बल्कि उसका निशाना देश के अन्य हिस्सों, खासकर दक्षिण भारत के राज्य भी थे। पुलिस के अनुसार, भाषा, क्षेत्र और आर्थिक प्रोफाइल को ध्यान में रखकर लोगों को टारगेट किया जाता था। यह भी संभावना जताई जा रही है कि गिरोह के पास पहले से एकत्रित डेटा, मोबाइल नंबरों की सूची या ऑनलाइन प्लेटफॉर्म से निकाली गई जानकारी हो सकती है, जिसका उपयोग संभावित शिकारों तक पहुंचने में किया जाता था।
सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि इस पूरे नेटवर्क में काम करने वाले कई युवकों को बाकायदा नौकरी की तरह रखा गया था। छापेमारी में गिरफ्तार किए गए युवकों से पूछताछ के दौरान यह जानकारी सामने आई कि उन्हें ठगी के इस काम के लिए हर महीने तय वेतन दिया जाता था। बताया जा रहा है कि इन्हें 15 हजार से 30 हजार रुपये तक की मासिक सैलरी पर रखा गया था। इसका मतलब यह है कि यह गिरोह साइबर अपराध को एक संगठित ‘रोजगार मॉडल’ की तरह चला रहा था, जहां अलग-अलग भूमिकाओं के लिए युवाओं की भर्ती की जाती थी।
गिरफ्तार किए गए आरोपियों में औरंगाबाद, गया और रोहतास जिलों के रहने वाले युवक शामिल बताए जा रहे हैं। पुलिस ने जिन पांच लोगों को पकड़ा है, उनमें शशांक शेखर, मनीष कुमार, सूर्यदीप राज, रिशु कुमार और सचिन कुमार के नाम सामने आए हैं। पूछताछ में पुलिस यह जानने की कोशिश कर रही है कि इन युवकों की भूमिका केवल कॉल, मैसेजिंग और बैंकिंग संचालन तक सीमित थी या वे ठगी की पूरी रणनीति और धन शोधन प्रक्रिया से भी जुड़े थे।
पुलिस अधिकारियों के अनुसार, इस गिरोह का मास्टरमाइंड अंकित कुमार बताया जा रहा है, जो छापेमारी के दौरान पुलिस को चकमा देकर फरार हो गया। अब पुलिस की प्राथमिकता उसकी गिरफ्तारी है, क्योंकि माना जा रहा है कि वही पूरे नेटवर्क का संचालन, वित्तीय नियंत्रण और बाहरी संपर्क संभालता था। यह भी आशंका है कि उसके पास अन्य शहरों या राज्यों में सक्रिय समान नेटवर्क की जानकारी हो सकती है।
जांच एजेंसियां अब गिरोह के बैंक खातों, डिजिटल वॉलेट्स, यूपीआई लेनदेन, सिम कार्ड रजिस्ट्रेशन और कॉल रिकॉर्ड की पड़ताल में जुट गई हैं। इससे यह पता लगाने की कोशिश की जा रही है कि अब तक कितने लोगों को निशाना बनाया गया, कितनी राशि की ठगी हुई और यह पैसा किन-किन खातों के जरिए घुमाया गया। पुलिस को संदेह है कि ठगी की रकम को कई खातों और डिजिटल चैनलों के माध्यम से ट्रांसफर कर उसकी ट्रेल छिपाने की कोशिश की जाती थी।
यह मामला केवल एक छापेमारी या पांच गिरफ्तारियों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह इस बड़े खतरे की ओर इशारा करता है कि साइबर अपराध अब रिहायशी फ्लैटों, छोटे दफ्तरों और अस्थायी ठिकानों से भी बड़े पैमाने पर संचालित हो रहे हैं। आम लोग अक्सर ऑनलाइन गेमिंग, निवेश, बोनस, कैशबैक, मैच प्रिडिक्शन या बेटिंग जैसी चीजों को मनोरंजन या त्वरित कमाई का साधन समझ बैठते हैं, लेकिन यही लालच कई बार उन्हें साइबर ठगों के जाल में फंसा देता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे गिरोह सबसे पहले भरोसा बनाने पर काम करते हैं। वे शिकार को छोटी-छोटी रकम में शुरुआती ‘फायदा’ दिखाते हैं या उसे यह अहसास कराते हैं कि सिस्टम पूरी तरह वैध है। कुछ मामलों में फर्जी स्क्रीनशॉट, बनावटी जीत, नकली भुगतान प्रमाण और अन्य लोगों की झूठी सफलता की कहानियां भी दिखाई जाती हैं। इसके बाद व्यक्ति धीरे-धीरे अधिक रकम निवेश करने लगता है और अंततः उसके पैसे डूब जाते हैं। कई मामलों में बैंकिंग डिटेल, ओटीपी, यूपीआई पिन या रिमोट एक्सेस के जरिए सीधे खाते भी खाली कर दिए जाते हैं।
पटना पुलिस की यह कार्रवाई इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि इसने यह स्पष्ट कर दिया है कि साइबर अपराध के खिलाफ अब स्थानीय स्तर पर भी अधिक सक्रिय और तकनीकी कार्रवाई की जा रही है। यदि इस तरह के नेटवर्क को समय रहते नहीं तोड़ा जाए, तो यह न केवल लोगों की मेहनत की कमाई लूटते हैं, बल्कि युवाओं को भी गलत रास्ते पर ले जाकर अपराध की दुनिया में धकेल देते हैं।
यह घटना समाज के लिए भी एक चेतावनी है। ऑनलाइन गेमिंग, सट्टेबाजी, फटाफट कमाई, बोनस रिवार्ड या दोगुना-तिगुना रिटर्न जैसे दावों से लोगों को बेहद सतर्क रहने की जरूरत है। किसी भी अज्ञात लिंक, ऐप, टेलीग्राम चैनल, व्हाट्सऐप ग्रुप या वेबसाइट पर भरोसा करने से पहले उसकी प्रामाणिकता की जांच जरूरी है। अगर कोई ऑफर असामान्य रूप से आकर्षक लगे, तो यह समझ लेना चाहिए कि उसके पीछे ठगी की आशंका हो सकती है।
कुल मिलाकर, पटना में सामने आया यह मामला साइबर अपराध के बदलते स्वरूप और उसकी गहराई को उजागर करता है। एक साधारण फ्लैट से चल रहा यह हाईटेक ठगी नेटवर्क इस बात का प्रमाण है कि अपराधी अब तकनीक, मनोविज्ञान और संगठित ढांचे—तीनों का इस्तेमाल कर रहे हैं। फिलहाल पुलिस जांच को आगे बढ़ा रही है और फरार मास्टरमाइंड सहित इस नेटवर्क से जुड़े अन्य संभावित चेहरों तक पहुंचने की कोशिश में जुटी है। आने वाले दिनों में इस मामले में और बड़े खुलासे होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

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